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Posted by Sulekha Pande

जलते बुझते लोग ....

सीट बेल्ट  बाँधने  की घोषणा हो रही थी ...
प्रिया ने अपनी बगल में बैठे नन्हे धैर्य की सीट बेल्ट बाँधी  और अपनी पेटी भी कस ली 

एयर पोर्ट पर जब प्रिया  ने अपने पति वीर को देखा तो  इतनी देर से रोके हुए उसके आंसू सब्र के बाँध को तोड़  आँखों से बह चले ..
वीर ने बेटे को गोदी में उठाया और सभी कार  की और बढ़ चले ..

कुछ दूर का सफ़र ख़ामोशी से कटा ...
वीर ने धीरे से प्रिया से पूछा , " आखिर हुआ क्या था " ?
प्रिया  ने संक्षिप्त उत्तर दिया  ज़्यादा  कुछ नहीं , बस ज़रा सी बहस में  तिल  का ताड़ बन गया ..

और कहते हुए वह दो दिन पूर्व हुयी घटना को जैसे अपनी आँखों से वापस देखने लगी ....

बात सचमुच बड़ी नहीं थी ,पर बड़ी कर दी गई थी ...

हुआ यूँ था  कि प्रिया की भतीजी ,लगभग पंद्रह वर्षीय  प्रियंका जो नकचढ़ी और माता  पिता की सरचढ़ी बेटी होने के  कारण कभी कभी बदतमीजी की  सारी  हदें पार कर देती , प्रिया  का मायके आना उसकी भाभी और भतीजी को नागवार गुज़रता और भाभी अक्सर तानों से से छेद  भी देती 
किन्तु कहते हैं न  कि जीते जी लड़की का मायके का  मोह छूटता  नहीं , 
सो  प्रिया अपनी सुखी और संपन्न ससुराल से अक्सर ही अपने मायके चली आती , 
अपने पिता की सबसे ज्यादा लाडली थी वह , असमय पिता की मृत्यु के बाद जल्द ही उसका ब्याह कर माँ ने अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्ति पा ली थी , 
जल्दी से शादी और साल डेढ़ साल में एक  बेटा  , अभी सात साल ही हुए थे पर मायके का आकर्षण उसे बार बार खींच ले जाता ...

अपने भोलेपन में वह यही समझती कि  जितना प्यार उसे अपने परिवार से है , उतना ही प्यार वे भी उसे करते  होंगे ..
कितना गलत सोचती थी वह उसका अंदाज़ा प्रिया को तब हुआ जब उसकी बहस प्रियंका से हुई ..

बात खाने पर से शुरू हुयी , जीवन में पहली बार प्रिया ने भी मुंह खोला और ज़रा सा ही बोली थी कि  अपनी भतीजी की  बात तीर की तरह उसे चुभी ..
"मम्मी ये दोनों  बहनें इस घर के लालच में यहाँ आती हैं .."
प्रिया पर जैसे गाज गिरी ...

उसने कभी सोचा नहीं था कि  प्रियंका उसे इतना  गिरा हुआ  और लालची समझती है ...

फिर भी प्रिया  ने कहा  कि यह घर सिर्फ तुम्हारा नहीं , मेरे पिता का है ....

पर जब उसकी भाभी ने यह कह दिया  कि  घर पिता का है तो क्या ...
पिता तो नहीं हैं न .....

क्षोभ , दुःख , अपमान और तकलीफ से प्रिया की आँखें भर आयीं और उसने आव देखा न ताव , जैसे तैसे सूटकेस  में अपने कपडे भरे , सोते हुए बेटे को जगाया , और सीधे तीर की तरह  बाहर चल पड़ी ...

अपनी माँ को उसने वही  आखिरी  बार देखा ....
उस समय उसे यही लगा कि  कोई तो रोक लेगा , पर जब उसकी माँ भी खामोश रही तो उसने टैक्सी  की  और अपनी सहेली के घर चली गयी ...
रात के बारह बजे जब उसने नूतन के घर की घंटी बजायी , तो दरवाज़ा खोल कर खड़ी उसकी  अनन्य  सखी ने एक बार भी नहीं पूछा  कि क्या हुआ ..बिना  कुछ भी  कहे समझने वाला बचपन का साथ था दोनों का ..

उसे अन्दर ले गयी और सब बात सुनी ..
फिर उठी और प्रिया  के पति वीर को फ़ोन लगाया और  प्रिया  की बात करायी ...
वीर ने  प्रिया  से कहा तुम कल की फ्लाइट पकड़ कर फ़ौरन दिल्ली आओ ..
वहां रुकने की कोई ज़रुरत  नहीं ...

दुसरे दिन  जब एयर पोर्ट से विदा ली तो प्रिया   अपनी सखी से लिपट कर खूब रोई ..
जब माँ    बेटा फ्लाइट में बैठे तो धैर्य बार बार अपनी माँ का अश्रु सिक्त चेहरा देख कर हैरान हो रहा था कि  हमेशा खुश रहने वाली उसकी माँ को हो क्या गया है ..
उसने अपनी माँ से पूछा , " माँ हम रात को नूतन मौसी के घर क्यों चले गए ? " 
प्रिया ने कहा ऐसे  ही बेटे , तुम्हारी मामी जी को हमसे प्रॉब्लम हो रही थी न इसीलिए ..

माँ वो घर किसका है ??
नानाजी का न ??

हाँ बेटे , वो घर पहले  नानाजी  का था , अब मामा जी और मामी जी का है ...

तो फिर दिल्ली वाला घर किसका है माँ ?
बेटे  दिल्ली वाला घर पापा और दादाजी का है ...

और पापा और दादा जी के बाद ??
तब वो घर मेरा होगा ??

हाँ  बेटा  ,तब वो घर तुम्हारा होगा ...

तो फिर आपका घर कहाँ है माँ ??

इसका कोई जवाब  प्रिया के पास नहीं था ...
वह खुद भी  गुम  थी इसी उधेड़बुन में कि  ,  उसका घर अगर है , तो कहाँ और कौन सा ....

अँधेरा हो  चुका था ....

सड़कों पर रौशनी थी ,हर जगह भीड़  भाड़  के बीच लोग चले जा रहे थे ...

हलकी बारिश के बाद सड़क की रोशनियों में दप दप करते जलते बुझते लोग ...

और प्रिया के भीतर एक जलता बुझता प्रश्न ..

मेरा घर कहाँ है ???


10/ 09/2012
 

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