मैं .........
मैं ,मैं नारी हूँ ,
स्वर्ग से उतरी ,
अमृत की वह पवित्र बूंद ,
जिसको पीने से ,अमरत्व की प्राप्ति होती है ,
पर क्या ,
आज भी वह दर्जा आ सकी हूँ मैं ??
जो मेरा भी जन्मसिद्ध अधिकार होना चाहिए .
सबको नज़र आता है , तो ,
सिर्फ मेरा रूप ,टिकती हैं सबकी आँखें ,
मेरी आँखें , मेरे होंठ , मेरे वक्ष पर ...
क्या मेरी आँखों में झांक कर देखी है ,
किसीने , मेरी वेदना , ,
सुना है मेरा मूक चीत्कार ,
क्या सुने हैं किसीने ,मेरे होंठों के अनकहे शब्द ??
क्या किसी ने कभी सोचा ,
कि ,मेरे अंदर एक हृदय है ,
जो संवेदनशील है , जो धड़कता है ,
जो धधकता है ,
जब तुम मुझे खुद से ,छोटा ,
हीन और कम अक्ल मानते हो .
क्या तुम कभी माप पाये ,
मेरे हृदय की अंतहीन सीमारेखा ?
तुम तो मुझे देवी बना कर पूजते रहे.....
पर देवी तो पाषाण है ,
मैं इन्सान हूँ
मगर तुम मुझे इन्सान मानते तो ,
कभी दोयम दर्जा ना देते .
दोयम मैं हूँ भी नहीं ..
तुम नर हो ,
मुझमें तुमसे दो मात्राएँ अधिक हैं ,
मैं नारी हूँ , तुमसे कहीं अधिक सबल ,
तुमसे कहीं अधिक सशक्त ..
मैं पराधीन नहीं ....
मैं पराधीन नहीं ....
सुलेखा पांडे...
8/3/11 .



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