अजनबीपन ....
दर्पण के पीछे है
एक
और दर्पण ..
मन के भीतर है ,
एक और मन ..
शब्दों के जाल में ,
अनजाने भाव हैं ,
ऊपर से गहराई
नापते हैं हम ..
रात की सियाही में ,
दर्द के सैलाब पर ,
अँधेरे की चादर ,
तानते हैं हम ..
शूलों के दर्द में ,
फूल जो महका ,
उसकी ही रूह से ,
अनजान हैं हम ..
अपनी ही काया के ,
भीतर जो छाया है ,
उसकी सच्चाई कब ,
पहचानते हैं
हम ...



0 comments:
Post a Comment